अपनी बदल के सूरते किरदार जैसा हो गया ।
आदमी खुदगर्जी में फनकार जैसा हो गया ॥
देखता हु जिस तरफ आती नजर मायूसिया ।
हादसों का यह शहर अखबार जैसा हो गया ॥
मांगता है कीमते रिश्तो की अपने बेहिचक ।
आदमी का सोचना बाजार जैसा हो गया ॥
बढ़ गई है तल्ख़िया रिश्तो में कुछ इस कदर ।
अंदाज ए गुफ्तगू भी तलवार जैसा हो गया ॥
बेतकुलफ बेसबब अब कहा कहा बातें रही ।
सास लेना भी यहाँ दुश्वार जैसा हो गय॥
अब कहा उठती है बाहे अब गले लगता है कौन।
कुछ हमारे दरमियाँ दीवार जैसा हो गया ॥
जेब भरने की हवस मे खोखला होता गया ।
ज़िन्दगी का फलसफा व्यापार जैसा होता गया दोस्त॥
----- राही
