Sunday, 21 February 2016

















अपनी बदल के सूरते किरदार जैसा हो गया ।
आदमी खुदगर्जी में फनकार जैसा हो गया ॥

देखता हु जिस तरफ आती नजर मायूसिया ।
हादसों का यह शहर अखबार जैसा हो गया ॥

मांगता है कीमते रिश्तो  की अपने  बेहिचक ।
आदमी का सोचना बाजार जैसा हो गया ॥

बढ़ गई है तल्ख़िया रिश्तो में कुछ इस कदर ।
अंदाज ए गुफ्तगू भी तलवार जैसा हो गया ॥

बेतकुलफ बेसबब अब कहा कहा बातें रही ।
सास लेना भी यहाँ दुश्वार जैसा हो गय॥

अब कहा उठती है बाहे अब गले  लगता है कौन।
कुछ हमारे दरमियाँ दीवार जैसा हो गया ॥

जेब भरने की हवस मे खोखला होता गया ।
ज़िन्दगी का फलसफा व्यापार जैसा होता गया  दोस्त॥
                                           
                                                                                  -----   राही